Thursday, September 4, 2025

विरह की व्यथा

 मैं स्पष्ट नहीं हूँ —

तुम्हें पाने या खोने के विषय में,

बस इतना जानती हूँ,

कि सुख की वह धूप

मेरी देहरी पर कभी नहीं उतरी।


दुख की परछाइयों में

सदा निकट रही हूँ,

विरह की व्यथा का

हर दिवस वरण किया है।


स्वयं को तैयार करती रही

उस महाविप्लव के लिए,

जिसकी भावनाओं की बाढ़ में

एक दिन बह जाऊँगी।


कब होगी वह घड़ी —

मैं नहीं जानती,

पर इतना निश्चित है

कि तुम्हारे समीप

अपने अस्तित्व को

कभी नहीं देख पाई।


तुम्हारे जाने के उपरांत

स्वप्नों के आँगन में

तुम्हें फिर पा लूँगी,

जहाँ तुम सदा

मेरे संग चलोगे।


रात्रि की प्रतीक्षा करूंगी प्रतिदिन 

उन मधुर स्वप्नों के लिए,

जो मेरे हृदय में

साहस के दीपक जलाएंगे।


मैं स्पष्ट हूँ केवल इतना —

हममें कोई समानता नहीं,

मैं सदा रही, तुम्हारी पसंद से परे।


हमारा मिलन —

सृष्टि के लिए एक रहस्य है,

पर बिछड़ना —

भाग्य का उद्घोष।


कुछ भी नया नहीं है

हमारे संबंध में,

सब वही है

जैसा औरों के जीवन में होता है।


और आज भी

मैं स्पष्ट नहीं हूँ —

कैसे सहूँगी

इस बिरहा की अग्नि

जो मन के हर कोने को

धीरे-धीरे भस्म करती है।

-@Maira



10 comments:

Anonymous said...

बहुत सुंदर दिल को छू लेने वाली कविता। .........

Priyahindivibe | Priyanka Pal said...

सुंदर सृजन

Maira said...

शुक्रिया आपका

Maira said...

धन्यवाद आपका

yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में रविवार 07 सितंबर 2025 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

हरीश कुमार said...

बहुत सुंदर रचना

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

हमारा मिलन —

सृष्टि के लिए एक रहस्य है,

पर बिछड़ना —

भाग्य का उद्घोष

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

🙏🙏

नूपुरं noopuram said...

मनोव्यथा की कथा क्या कहूँ ? संवेदनशील रचना ।

सुशील कुमार जोशी said...

सुंदर लेखन