सोच की कोई दिशा नहीं पर समझ की सुन्दर काया है Soch ki koi disha nahi pr samjh ki sundar kaya hai.
Monday, December 15, 2025
Friday, September 26, 2025
क्षमता
अधिक बुद्धि प्रायः कष्ट देती है,
गहरी भावनाएँ जीवन को संक्षिप्त करती हैं।
परंतु आगे एक खुला रास्ता है,
हर मोड़ पर अवसर हैं।
फिर भी तुम्हारी दृष्टि इसे देख नहीं पाती,
जीवन में हालात; या तो अच्छे या फिर बुरे होते हैं।
भांति - भांति के लोग व विचार होते हैं,
परंतु वे किसी का दर्जा तय नहीं करते।
सत्य यही है -
जब तक तुम दयालु हो, चाहे तुम्हारी शारीरिक क्षमताएँ सीमित हो,
तब भी तुम बदलाव ला सकते हो, जीवन जगत में उजियारा कर सकते हो।
-@maira
Thursday, September 4, 2025
विरह की व्यथा
मैं स्पष्ट नहीं हूँ —
तुम्हें पाने या खोने के विषय में,
बस इतना जानती हूँ,
कि सुख की वह धूप
मेरी देहरी पर कभी नहीं उतरी।
दुख की परछाइयों में
सदा निकट रही हूँ,
विरह की व्यथा का
हर दिवस वरण किया है।
स्वयं को तैयार करती रही
उस महाविप्लव के लिए,
जिसकी भावनाओं की बाढ़ में
एक दिन बह जाऊँगी।
कब होगी वह घड़ी —
मैं नहीं जानती,
पर इतना निश्चित है
कि तुम्हारे समीप
अपने अस्तित्व को
कभी नहीं देख पाई।
तुम्हारे जाने के उपरांत
स्वप्नों के आँगन में
तुम्हें फिर पा लूँगी,
जहाँ तुम सदा
मेरे संग चलोगे।
रात्रि की प्रतीक्षा करूंगी प्रतिदिन
उन मधुर स्वप्नों के लिए,
जो मेरे हृदय में
साहस के दीपक जलाएंगे।
मैं स्पष्ट हूँ केवल इतना —
हममें कोई समानता नहीं,
मैं सदा रही, तुम्हारी पसंद से परे।
हमारा मिलन —
सृष्टि के लिए एक रहस्य है,
पर बिछड़ना —
भाग्य का उद्घोष।
कुछ भी नया नहीं है
हमारे संबंध में,
सब वही है
जैसा औरों के जीवन में होता है।
और आज भी
मैं स्पष्ट नहीं हूँ —
कैसे सहूँगी
इस बिरहा की अग्नि
जो मन के हर कोने को
धीरे-धीरे भस्म करती है।
-@Maira
Friday, August 1, 2025
विशिष्टता
हम विशिष्ट नहीं बन पाते ,
क्योंकि हम नहीं स्वीकारते
गलती, दुख, प्रेम और न जाने क्या - क्या ।।
किताबें वही पढ़ते हैं,
जिनका पृष्ठ आकर्षक लगे।
प्रसाधन वही खरीदते हैं,
जिनका विज्ञापन बहुचर्चित हो|
सिनेमा वही देखते हैं ,
जो अच्छी खासी बिकी हो
अब तो बातें भी वही करते हैं,
जो फायदा दिलाती हो।
हम विशिष्ट नहीं बन पाते. . . . . . . . . . ।
लगातार चलते जाते हैं उस पंक्ति में,
जहां न खत्म होने वाली भीड़ हो ।
दूसरों को तकते हैं उम्मीद भरी निगाह से,
और स्वयं से कोई वादा निभा नहीं पाते।
दिन रात दौड़ते भागते रहते हैं ,
कभी लिख नहीं पाते, गा नहीं पाते, बना भी नहीं पाते।
हम विशिष्ट नहीं बन पाते।।
ठंड में ठिठुरना नहीं चाहते,
गर्मी में पिघलना नहीं चाहते ,
बरसात में भीगना नहीं चाहते ।
जो पास है उसे महसूस करना नहीं चाहते,
अपनी विशेषता छोड़, दूसरे जैसा बन जाते।
इसीलिए हम विशिष्ट नहीं बन जाते. . . . . . . . । ।
| विशिष्टता |
Saturday, May 17, 2025
बदलता है जीवन
कहीं तारों से भरा हुआ रात का आसमाँ है,
तो कहीं खिलखिलाती सुबह की चमक है।
ये रंग जिन्हें हम अपनी दोनों आँखों से देखते हैं,
अकसर बदलते रहते हैं ।
तारों से भरी रात में ये पीला रंग,
सुनहरी बारिश की तरह है।
या फिर एक सुंदर लाल फूल
जैसे अंधेरे में जोश से जलता हुआ
मन में छुपा एक जुनून है ।
हर रंग में बसता है जीवन,
जब बदलते हैं रंग तब
बदलता है जीवन ।। -@maira
Thursday, May 1, 2025
खुश हूँ
खुश हूँ
Sunday, October 13, 2024
शहर की रानाईयां
जगमगाते शहर के रानाईयों में, क्या न था
ढूंढने निकला था जिसको मैं, वही चेहरा न था ।।
मिलते चले लोग कई, राह में क्या न था
ढूंढने निकला था जिसको मैं, वही सुकून ना ।।
उजले चांद की चांदनी में, क्या न था
ढूंढने निकला था जिसको मैं, वही तारा न था ।।
मैं वही, तुम वही, यह रास्ते, मंजिल वही,
इस सफर में क्या न था ?
ढूंढने निकला था जिसको मैं, वही चेहरा न था।।
जगमगाते शहर के रानाईयों में, क्या न था
ढूंढने निकला था जिसको मैं, वही चेहरा न था ।।
-@maira
Wednesday, July 3, 2024
किताबें (Kitabein)
किताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाक़ातें नहीं होतीं
जो शामें उन की सोहबत में कटा करती थीं, अब अक्सर
गुज़र जाती हैं कम्पयूटर के पर्दों पर
बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है
बड़ी हसरत से तकती हैं
जो क़द्रें वो सुनाती थीं
कि जिन के सेल कभी मरते नहीं थे
वो क़द्रें अब नज़र आती नहीं घर में
जो रिश्ते वो सुनाती थीं
वो सारे उधड़े उधड़े हैं
कोई सफ़्हा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ़्ज़ों के मअ'नी गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे तुंड लगते हैं वो सब अल्फ़ाज़
जिन पर अब कोई मअ'नी नहीं उगते
बहुत सी इस्तेलाहें हैं
जो मिट्टी के सकोरों की तरह बिखरी पड़ी हैं
गिलासों ने उन्हें मतरूक कर डाला
ज़बाँ पर ज़ाइक़ा आता था जो सफ़्हे पलटने का
अब उँगली क्लिक करने से बस इक
झपकी गुज़रती है
बहुत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है पर्दे पर
किताबों से जो ज़ाती राब्ता था कट गया है
कभी सीने पे रख के लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रेहल की सूरत बना कर
नीम सज्दे में पढ़ा करते थे छूते थे जबीं से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल और
महके हुए रुकए
किताबें माँगने गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उन का क्या होगा
वो शायद अब नहीं होंगे!
- गुलज़ार
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Sunday, June 30, 2024
बरसात की बूंदों में (Barsat ki Bundo mein)
बरसात की बूंदों में लिपटी ये रात,
याद आने लगीं बीतीं सारी बात।
कली की तरह खिल रही है ये बरसात,
हर सांस हुई गुलजार, पुष्पशाला सी बनी रात।
गीत गाती हैं बूंदें, सरगम की धुन सुना रहा आसमां,
इस नए रंग में सजी, मौसम की पहली बरसात ।
भीनी सी ठंडक, उलझनों की आग बुझाने लगी,
दर्द के रागों में बंधी, सुकून की लोरियाँ सुनाती ये रात।
गहरी आँखों में बसी, बे फ़िकर सी ये बरसात,
ख्वाबों का धुंधला सिलसिला, प्यार भरी बातें साथ।
बरसात की रिमझिम सुन, दिल की धड़कन भी बढ़ी,
जीवन की गहराईयों में डूबती ये रात ।
बरसात की बूंदों में लिपटी ये रातें.......................। ।
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Wednesday, June 26, 2024
कौन सी बात है तुम में ऐसी, इतने अच्छे क्यूँ लगते हो
इतनी मुद्दत बा'द मिले हो
किन सोचों में गुम फिरते हो
इतने ख़ाइफ़ क्यूँ रहते हो
हर आहट से डर जाते हो
तेज़ हवा ने मुझ से पूछा
रेत पे क्या लिखते रहते हो
काश कोई हम से भी पूछे
रात गए तक क्यूँ जागे हो
में दरिया से भी डरता हूँ
तुम दरिया से भी गहरे हो
कौन सी बात है तुम में ऐसी
इतने अच्छे क्यूँ लगते हो
पीछे मुड़ कर क्यूँ देखा था
पत्थर बन कर क्या तकते हो
जाओ जीत का जश्न मनाओ
में झूटा हूँ तुम सच्चे हो
अपने शहर के सब लोगों से
मेरी ख़ातिर क्यूँ उलझे हो
कहने को रहते हो दिल में
फिर भी कितने दूर खड़े हो
रात हमें कुछ याद नहीं था
रात बहुत ही याद आए हो
हम से न पूछो हिज्र के क़िस्से
अपनी कहो अब तुम कैसे हो
'मोहसिन' तुम बदनाम बहुत हो
जैसे हो फिर भी अच्छे हो
- शायर मोहसिन
Thursday, June 20, 2024
नहीं तो
ये ग़म क्या दिल की आदत है?
ये ग़म क्या दिल की आदत है? नहीं तो
किसी से कुछ शिकायत है? नहीं तो
है वो इक ख़्वाब-ए-बे ताबीर इसको
भुला देने की नीयत है? नहीं तो
किसी के बिन किसी की याद के बिन
जिए जाने की हिम्मत है? नहीं तो
किसी सूरत भी दिल लगता नहीं? हाँ
तो कुछ दिन से ये हालत है? नहीं तो
तुझे जिसने कहीं का भी नहीं रक्खा
वो इक ज़ाती सी वहशत है? नहीं तो
तेरे इस हाल पर है सब को हैरत
तुझे भी इस पे हैरत है? नहीं तो
हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी
तुझे इस पर नदामत है? नहीं तो
वो दरवेशी जो तज कर आ गया तू
ये दौलत उस की क़ीमत है? नहीं तो
हुआ जो कुछ यही मक़सूम था क्या?
यही सारी हिकायत है? नहीं तो
अज़ीयत-नाक उम्मीदों से तुझको
अमाँ पाने की हसरत है? नहीं तो
तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम
तो इसकी वजह फ़ुर्सत है? नहीं तो
वहाँ वालों से है इतनी मोहब्बत
यहाँ वालों से नफ़रत है? नहीं तो
सबब जो इस जुदाई का बना है
वो मुझसे ख़ूबसूरत है? नहीं तो
@John Aulia
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Monday, March 18, 2024
सादगी
सादगी
सादगी तो हमारी जरा देखिये, एतबार आपके वादे पे कर लिया |
इक हिचकी में कह डाली सब दास्तान, हमने किस्से को यूँ मुख़्तसर कर लिया ||
सादगी तो हमारी ज़रा देखिए एतबार आप के वादे पर कर लिया ।।
बात तो सिर्फ़ इक रात की थी मगर इंतिज़ार आप का उम्र-भर कर लिया
इश्क़ में उलझनें पहले ही कम न थीं और पैदा नया दर्द-ए-सर कर लिया
लोग डरते हैं क़ातिल की परछाईं से हम ने क़ातिल के दिल में भी घर कर लिया
ज़िक्र इक बेवफ़ा और सितमगर का था आप का ऐसी बातों से क्या वास्ता
आप तो बेवफ़ा और सितमगर नहीं आप ने किस लिए मुँह उधर कर लिया
ज़िंदगी-भर के शिकवे गिले थे बहुत वक़्त इतना कहाँ था कि दोहराते हम
एक हिचकी में कह डाली सब दास्ताँ हम ने क़िस्से को यूँ मुख़्तसर कर लिया
बे-क़रारी मिलेगी मुझे न सुकूँ चैन छिन जाएगा नींद उड़ जाएगी
अपना अंजाम सब हम को मालूम था आप से दिल का सौदा मगर कर लिया
ज़िंदगी के सफ़र में बहुत दूर तक जब कोई दोस्त आया न हम को नज़र
हम ने घबरा के तन्हाइयों से 'सबा' एक दुश्मन को ख़ुद हम-सफ़र कर लिया ।।
@नुसरत फतेह अली खां साहब
Sunday, January 14, 2024
कुछ दिन तो बसो
कुछ दिन तो बसो मिरी आँखों में
फिर ख़्वाब अगर हो जाओ तो क्याकोई रंग तो दो मिरे चेहरे को
फिर ज़ख़्म अगर महकाओ तो क्या
जब हम ही न महके फिर साहब
तुम बाद-ए-सबा कहलाओ तो क्या
इक आइना था सो टूट गया
अब ख़ुद से अगर शरमाओ तो क्या
तुम आस बंधाने वाले थे
अब तुम भी हमें ठुकराओ तो क्या
दुनिया भी वही और तुम भी वही
फिर तुम से आस लगाओ तो क्या
मैं तन्हा था मैं तन्हा हूँ
तुम आओ तो क्या न आओ तो क्या
जब देखने वाला कोई नहीं
बुझ जाओ तो क्या गहनाओ तो क्या
अब वहम है ये दुनिया इस में
कुछ खोओ तो क्या और पाओ तो क्या
है यूँ भी ज़ियाँ और यूँ भी ज़ियाँ
जी जाओ तो क्या मर जाओ तो क्या








