Friday, November 11, 2022

मुस्कुराने की बात (Muskurane ki baat)

        


मुस्कुराने कीबात



आशियानेकी बात करते हो

दिल जलाने की बात करते हो

सारी दुनिया के रंज-ओ-ग़म दे कर

मुस्कुराने की बात करते हो

हम को अपनी ख़बर नहीं यारो

तुम ज़माने की बात करते हो

ज़िक्र मेरा सुना तो चढ़ के कहा

किस दिवाने की बात करते हो

हादसा था गुज़र गया होगा

किस के जाने की बात करते हो

-By Jawed Qureshi






Tuesday, November 8, 2022

वो हम-सफ़र था (Wo Hamsafar tha)

                



वो हम-सफ़र था



वो हम-सफ़र था मगर उस सेहम-नवाईन थी

कि धूप छाँव का आलम रहा जुदाई न थी

अदावतें थीं, तग़ाफ़ुल था, रंजिशें थीं बहुत

बिछड़ने वाले में सब कुछ था, बेवफ़ाई न थी

बिछड़ते वक़्त उन आँखों में थी हमारी ग़ज़ल

ग़ज़ल भी वो जो किसी को अभी सुनाई न थी

किसे पुकार रहा था वो डूबता हुआ दिन

सदा तो आई थी लेकिन कोई दुहाई न थी


वो हम-सफ़र था मगर उस सेहम-नवाईन थी

कि धूप छाँव का आलम रहा जुदाई न थी

@Naseer Turabi




Thursday, October 27, 2022

मैं दीपक हूँ(main deepak hun)

मैं दीपक हूँ


मैं दीपक हूँ, मेरा जलना ही तो
 मेरा मुस्काना है।

आभारी हूँ तुमने आकर

मेरा ताप-भरा तन देखा,

आभारी हूँ तुमने आकर
मेरा आह-घिरा मन देखा,
करुणामय वह शब्द तुम्हारा
’मुस्काओ’ था कितना प्यारा।
मैं दीपक हूँ, मेरा जलना ही तो मेरा मुस्काना है।

है मुझको मालूम!
पुतलियों में दीपों की लौ लहराती,
है मुझको मालूम कि
अधरों के ऊपर जगती है बाती,
उजियाला कर देने वाली
मुस्कानों से भी परिचित हूँ,
पर मैंने तम की बाहों में अपना साथी पहचाना है
मैं दीपक हूँ, मेरा जलना ही तो मेरा मुस्काना है। 
@H.R Bacchan


Wednesday, October 19, 2022

पहली सी मोहब्बत

 

            पहली सी मोहब्बत


मुझ से पहली सी मोहब्बत, मेरे महबूब, न माँग ....... 



मैंने समझा था के तू है तो दरख़्शां है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है 
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगों हो जाए
यूँ न था, मैंने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए

मुझ से पहली सी मोहब्बत, मेरे महबूब, न माँग..... 

लौट जाती है इधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न, मग़र क्या कीजे . ... 
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा.. 


मुझ से पहली सी मोहब्बत, मेरे महबूब, न माँग☂️☂️

              @Faiz 

Saturday, October 1, 2022

चाँद (Chaand)

 चाँद


आज फिर चाँद की पेशानी से उठता है धुआँ
आज फिर महकी हुई रात में जलना होगा
आज फिर सीने में उलझी हुई वज़नी साँसें
फट के बस टूट ही जाएँगी, बिखर जाएँगी
आज फिर जागते गुज़रेगी तेरे ख्वाब में रात
आज फिर चाँद की पेशानी से उठता धुआँ



Friday, September 30, 2022

इक ख़्वाब (ek khwab)

इक ख़्वाब (Ek khwab)

सुब्ह सुब्ह इक ख़्वाब की दस्तक पर दरवाज़ा खोला

सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आए हैं

आँखों से मानूस थे सारे

चेहरे सारे सुने सुनाए

पाँव धोए, हाथ धुलाए

आँगन में आसन लगवाए

और तन्नूर पे मक्की के कुछ मोटे मोटे रोट पकाए

पोटली में मेहमान मेरे

पिछले सालों की फ़सलों का गुड़ लाए थे

आँख खुली तो देखा घर में कोई नहीं था

हाथ लगा कर देखा तो तन्नूर अभी तक बुझा नहीं था

और होंटों पर मीठे गुड़ का ज़ाइक़ा अब तक चिपक रहा था

ख़्वाब था शायद!

ख़्वाब ही होगा!!

सरहद पर कल रात, सुना है चली, थी गोली

सरहद पर कल रात, सुना है

कुछ ख़्वाबों का ख़ून हुआ था 

-- गुलजार







मैं वही हूँ (Main Wahi Hoon)

मैं वही हूँ (Main Wahi Hoon)

 

जब सिरहाने बुझ रहा था 
रात भर जल कर दिया

देर तक  बैठी रही मैं , बैठी रही
सुबह के हल्के गुलाबी कोहरे से गुजरा मुसाफिर 
मेरे दरवाजे पे आकार रुक गया 
पूछा  मुझे
“वो कौन है ?”
“ वो कौन है?”

मैं ही मारे शर्म के कह न सकी
मैं  वही  हूँ
मैं  वही  हूँ
मैं  वही हूँ  वह  मेरे  मुसाफिर |

शाम आई जब सिरहाने पर जालना था दिया
देर तक बैठी रही खिड़की पे मैं
बैठी रही |

शाम की सुरखी में रथ पर लौटकर आया मुसाफिर
धूल थी कपड़ों पे
दरवाजे फिर पूछा मुझे

“वो कहाँ है ?
"वो कहाँ है ?”

मैं ही मारे शर्म के कह न सकी
मैं  वही  हूँ
मैं  वही  हूँ
मैं  वही हूँ  वह  मेरे  मुसाफिर |

बारिशों की रात है
कमरे में जलता है दिया 
फर्श पे बैठी हूँ खिड़की के तले 
और अंधेरी रात में अब गुनगुनाती रहती हूँ 
मैं  वही  हूँ
मैं  वही  हूँ
मैं  वही हूँ  वह  मेरे  मुसाफिर |

                            

-- By Gulzar





Monday, March 21, 2022

World poetry day

 


मैं बंदिशो से आज़ाद करूँ,
बेनाम सी आवाज़ को । 


लफ़्ज़ों के परवाज लगाकर, 
कह दूँ हर अरमान को। 

सर्द हवाओ मे आफताब सी, 
कहती हर मौसम की बेबसी । 


विरह मे सुकूं , हूँ  देती

प्रेम की कहती अभिलाषा भी।। 


"मेरी रचना, मेरी कल्पना "   - @maira 


❤❤World Poetry Day ❤❤









Thursday, March 17, 2022

इस सोच में (Is soch mein)

 

इस सोच में बैठा हूँ , क्या ग़म उसे पंहुचा है

बिखरी हुयी जुल्फें हैं, उतरा हुआ चेहरा है

इस सोच में बैठा हूँ...

 

मुड़कर भी नही देखा, झोंके की तरह उसने

वो मेरे बराबर से, हँसता हुआ गुजरा है

बिखरी हुयी जुल्फें हैं, उतरा हुआ चेहरा है

इस सोच में बैठा हूँ...

 

इस सोच में बैठा हूँ , क्या ग़म उसे पंहुचा है

बिखरी हुयी जुल्फें हैं, उतरा हुआ चेहरा है

इस सोच में बैठा हूँ... @Chandandas 💜❤





Tuesday, March 15, 2022

खुशबू की तरह khushabu ki tarah

खुशबू की तरह



ख़ुशबू की तरह आया वो तेज़ हवाओं में 

माँगा था जिसे हम ने दिन रात दुआओं में 

हम चाँद सितारों की राहों के मुसाफ़िर हैं 

हम रात चमकते हैं तारीक ख़लाओं में 

भगवान ही भेजेंगे चावल से भरी थाली 

मज़लूम परिंदों की मासूम सभाओं में 

दादा बड़े भोले थे सब से यही कहते थे 

कुछ ज़हर भी होता है अंग्रेज़ी दवाओं में #chandandas