मुस्कुराने कीबात
आशियानेकी बात करते हो
दिल जलाने की बात करते हो
सारी दुनिया के रंज-ओ-ग़म दे कर
मुस्कुराने की बात करते हो
हम को अपनी ख़बर नहीं यारो
तुम ज़माने की बात करते हो
ज़िक्र मेरा सुना तो चढ़ के कहा
किस दिवाने की बात करते हो
सोच की कोई दिशा नहीं पर समझ की सुन्दर काया है Soch ki koi disha nahi pr samjh ki sundar kaya hai.
आशियानेकी बात करते हो
दिल जलाने की बात करते हो
सारी दुनिया के रंज-ओ-ग़म दे कर
मुस्कुराने की बात करते हो
हम को अपनी ख़बर नहीं यारो
तुम ज़माने की बात करते हो
ज़िक्र मेरा सुना तो चढ़ के कहा
किस दिवाने की बात करते हो
कि धूप छाँव का आलम रहा जुदाई न थी
अदावतें थीं, तग़ाफ़ुल था, रंजिशें थीं बहुत
बिछड़ने वाले में सब कुछ था, बेवफ़ाई न थी
बिछड़ते वक़्त उन आँखों में थी हमारी ग़ज़ल
ग़ज़ल भी वो जो किसी को अभी सुनाई न थी
मैं दीपक हूँ
मैं दीपक हूँ, मेरा जलना ही तो
मेरा मुस्काना है।
आभारी हूँ तुमने आकर
मेरा ताप-भरा तन देखा,
आभारी हूँ तुमने आकर
मेरा आह-घिरा मन देखा,
करुणामय वह शब्द तुम्हारा
’मुस्काओ’ था कितना प्यारा।
मैं दीपक हूँ, मेरा जलना ही तो मेरा मुस्काना है।
है मुझको मालूम!
पुतलियों में दीपों की लौ लहराती,
है मुझको मालूम कि
अधरों के ऊपर जगती है बाती,
उजियाला कर देने वाली
मुस्कानों से भी परिचित हूँ,
पर मैंने तम की बाहों में अपना साथी पहचाना है
मैं दीपक हूँ, मेरा जलना ही तो मेरा मुस्काना है।
@H.R Bacchan
मुझ से पहली सी मोहब्बत, मेरे महबूब, न माँग .......
मैंने समझा था के तू है तो दरख़्शां है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगों हो जाए
यूँ न था, मैंने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
मुझ से पहली सी मोहब्बत, मेरे महबूब, न माँग.....
लौट जाती है इधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न, मग़र क्या कीजे . ...
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा..
मुझ से पहली सी मोहब्बत, मेरे महबूब, न माँग☂️☂️
@Faiz
आज फिर चाँद की पेशानी से उठता है धुआँ
आज फिर महकी हुई रात में जलना होगा
आज फिर सीने में उलझी हुई वज़नी साँसें
फट के बस टूट ही जाएँगी, बिखर जाएँगी
आज फिर जागते गुज़रेगी तेरे ख्वाब में रात
आज फिर चाँद की पेशानी से उठता धुआँ
इक ख़्वाब (Ek khwab)
सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आए हैं
आँखों से मानूस थे सारे
चेहरे सारे सुने सुनाए
पाँव धोए, हाथ धुलाए
आँगन में आसन लगवाए
और तन्नूर पे मक्की के कुछ मोटे मोटे रोट पकाए
पोटली में मेहमान मेरे
पिछले सालों की फ़सलों का गुड़ लाए थे
आँख खुली तो देखा घर में कोई नहीं था
हाथ लगा कर देखा तो तन्नूर अभी तक बुझा नहीं था
और होंटों पर मीठे गुड़ का ज़ाइक़ा अब तक चिपक रहा था
ख़्वाब था शायद!
ख़्वाब ही होगा!!
सरहद पर कल रात, सुना है चली, थी गोली
सरहद पर कल रात, सुना है
कुछ ख़्वाबों का ख़ून हुआ था
-- गुलजार
मैं वही हूँ (Main Wahi Hoon)
देर तक बैठी रही मैं , बैठी रही
सुबह के हल्के गुलाबी कोहरे से गुजरा मुसाफिर
मेरे दरवाजे पे आकार रुक गया
पूछा मुझे
“वो कौन है ?”
“ वो कौन है?”
मैं ही मारे शर्म के कह न सकी
मैं वही हूँ
मैं वही हूँ
मैं वही हूँ वह मेरे मुसाफिर |
शाम आई जब सिरहाने पर जालना था दिया
देर तक बैठी रही खिड़की पे मैं
बैठी रही |
शाम की सुरखी में रथ पर लौटकर आया मुसाफिर
धूल थी कपड़ों पे
दरवाजे फिर पूछा मुझे
“वो कहाँ है ?
"वो कहाँ है ?”
मैं ही मारे शर्म के कह न सकी
मैं वही हूँ
मैं वही हूँ
मैं वही हूँ वह मेरे मुसाफिर |
बारिशों की रात है
कमरे में जलता है दिया
फर्श पे बैठी हूँ खिड़की के तले
और अंधेरी रात में अब गुनगुनाती रहती हूँ
मैं वही हूँ
मैं वही हूँ
मैं वही हूँ वह मेरे मुसाफिर |
मैं बंदिशो से आज़ाद करूँ,
बेनाम सी आवाज़ को ।
लफ़्ज़ों के परवाज लगाकर,
कह दूँ हर अरमान को।
सर्द हवाओ मे आफताब सी,
कहती हर मौसम की बेबसी ।
विरह मे सुकूं , हूँ देती
प्रेम की कहती अभिलाषा भी।।
इस सोच में बैठा हूँ , क्या ग़म उसे पंहुचा है
बिखरी हुयी जुल्फें हैं, उतरा हुआ चेहरा है
इस सोच में बैठा हूँ...
मुड़कर भी नही देखा, झोंके की तरह उसने
वो मेरे बराबर से, हँसता हुआ गुजरा है
बिखरी हुयी जुल्फें हैं, उतरा हुआ चेहरा है
इस सोच में बैठा हूँ...
इस सोच में बैठा हूँ , क्या ग़म उसे पंहुचा है
बिखरी हुयी जुल्फें हैं, उतरा हुआ चेहरा है
इस सोच में बैठा हूँ... @Chandandas 💜❤
खुशबू की तरह
ख़ुशबू की तरह आया वो तेज़ हवाओं में
माँगा था जिसे हम ने दिन रात दुआओं में
हम चाँद सितारों की राहों के मुसाफ़िर हैं
हम रात चमकते हैं तारीक ख़लाओं में
भगवान ही भेजेंगे चावल से भरी थाली
मज़लूम परिंदों की मासूम सभाओं में
दादा बड़े भोले थे सब से यही कहते थे
कुछ ज़हर भी होता है अंग्रेज़ी दवाओं में #chandandas